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India Brics को बढ़ाते हुए US के साथ संबंध नहीं तोड़ता

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September 14, 2026 9:08 AM
India Brics

नई दिल्ली में आयोजित हालिया ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की दोहरी रणनीति को स्पष्ट किया: India Brics को मजबूत करना और साथ ही संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक साझेदारी को बरकरार रखना। इस संतुलन को दर्शाते हुए, अमेरिकी टिप्पणीकारों ने शिखर को “ज्यादा चेतावनी नहीं, बल्कि सतर्कता” के रूप में मूल्यांकित किया, जबकि भारत ने व्यापारिक बाधाओं और एकतरफ़ा टैरिफ़ों के खिलाफ संयुक्त घोषणा की।

India Brics

इस संदर्भ में India Brics से जुड़ी जानकारी भी महत्वपूर्ण है।

शिखर में प्रमुख उपस्थितियों में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, तथा ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन शामिल थे। शिखर के दौरान जारी “न्यू दिल्ली घोषणा” ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सिद्धांतों की रक्षा की वकालत की और एकतरफ़ा प्रतिबंधों को “वैश्विक वाणिज्य में विकृति” बताया। यह बयान, जबकि ब्रिक्स के भीतर आर्थिक सहयोग को सुदृढ़ करने का इरादा रखता है, फिर भी अमेरिकी हितों को सीधे चुनौती नहीं देता।

India Brics और अमेरिकी नीति में नई जटिलता

अमेरिकी मीडिया ने शिखर के परिणामों को “विभाजित ब्रिक्स कोई अमेरिकी चुनौती नहीं” के शीर्षक से विश्लेषित किया। वॉशिंगटन पोस्ट ने कहा कि “ब्रिक्स नेताओं का मिलन, जब युद्ध और प्रतिद्वंद्विताएँ समूह को तनाव में डालती हैं, तब भी भारत इस मंच को यूएस को न घेरने के उद्देश्य से संचालित करता है।” न्यूयॉर्क टाइम्स ने यह रेखांकित किया कि “चीन ब्रिक्स को अमेरिकी शक्ति को चुनौती देना चाहता है, जबकि भारत इसे इतना व्यापक बनाना चाहता है कि देशों को विकल्प चुनने की ज़रूरत न पड़े।” इस प्रकार, India Brics की रणनीति को दोधारी तलवार के रूप में देखा जा रहा है, जो आर्थिक सहयोग को बढ़ाते हुए भू‑राजनीतिक तनाव को कम करने का प्रयास करती है।

भू‑राजनीतिक खेल में संगीत कुर्सी

शिखर के बाद के विश्लेषकों ने कहा कि ब्रिक्स का विस्तार “संगीत कुर्सी” जैसा हो गया है, जहाँ कोई भी सदस्य पूरी तरह से बाहर नहीं होता। भारत ने इस मंच को अपने “वैश्विक दक्षिण” के प्रतिनिधित्व के रूप में उपयोग किया, जबकि साथ ही क्वाड (Quad) जैसे अन्य सुरक्षा गठबंधनों में अपनी भागीदारी जारी रखी। इस दोहरी नीति के पीछे प्रमुख कारण भारत की आर्थिक जरूरतें, सुरक्षा चिंताएँ, और वैश्विक मंच पर बढ़ती महत्ता हैं।

विशेष रूप से, मोदी‑शी मुलाकात को व्यापक रूप से देखा गया, क्योंकि यह दोनों देशों के बीच “रसोई में हुई आग” के बाद पुनः संपर्क का प्रतीक था। स्टिमसन सेंटर के विश्लेषक युन सून ने कहा, “चीन भारत की रणनीतिक पसंद को आकार देना चाहता है, ताकि भारत चीन को खतरा न मानें और स्वाभाविक रूप से यूएस के साथ पक्ष नहीं ले।” इस संदर्भ में, India Brics का मंच भारत को चीन के साथ सहयोग को संतुलित करने का अवसर प्रदान करता है, जबकि अमेरिकी संबंधों को भी नज़रअंदाज़ नहीं करता।

आर्थिक आँकड़े और ब्रिक्स का वास्तविक प्रभाव

ब्रिक्स अब विश्व की लगभग आधी जनसंख्या, 40 % वैश्विक जीडीपी, और 25 % से अधिक अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है। इन आँकड़ों के बावजूद, कई अमेरिकी विशेषज्ञ इस बात से आश्वस्त हैं कि समूह ने अभी तक डॉलर को प्रतिस्थापित नहीं किया, कोई सामान्य मुद्रा नहीं बनाई, और न ही नाटो के उलटे रूप में कोई सैन्य गठबंधन स्थापित किया है। यही कारण है कि “ट्रम्प ब्रिक्स में फँस गया” जैसी टिप्पणी भी सीमित रूप में ही सामने आई।

कॉलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री जेफ्री सैक्स ने शिखर से पहले कहा था कि “भारत और चीन मिलकर एक बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था बना सकते हैं,” और उन्होंने ब्रिक्स को “विश्व की आधी जनसंख्या और आर्थिक उत्पादन” वाला मंच बताया। सैक्स ने यह भी सुझाव दिया कि भारत को क्वाड से बाहर होना चाहिए, जिससे वह अधिक स्वतंत्र रूप से India Brics के भीतर कार्य कर सके। हालांकि, भारत ने क्वाड में अपनी सदस्यता जारी रखी है, जिससे उसकी बहु‑पक्षीय नीति की बहु‑आयामी प्रकृति स्पष्ट होती है।

अमेरिका‑भारत संबंधों का भविष्य

शिखर के बाद, अमेरिकी व्हाइट हाउस या स्टेट डिपार्टमेंट ने कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया, लेकिन कई विश्लेषकों ने संकेत दिया कि ट्रम्प प्रशासन “ब्रिक्स के कारण खुद को अलग-थलग” महसूस कर रहा है। मेइडासटच जैसे विरोधी-ट्रम्प प्लेटफ़ॉर्म ने “ट्रम्प को ब्रिक्स में धकेला गया” शीर्षक से टिप्पणी की, जबकि मुख्यधारा के अमेरिकी मीडिया ने कहा कि “ब्रिक्स अभी भी बहुत विभाजित है, इसलिए इसका अमेरिकी शक्ति पर सीधा असर नहीं है।” इस परिप्रेक्ष्य में, India Brics का संतुलन भारत को दोनों पक्षों के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने की अनुमति देता है, जिससे वह वैश्विक मंच पर अपनी आवाज़ को अधिक प्रभावी बना सके।

आगे देखते हुए, भारत का लक्ष्य ब्रिक्स को “इतना व्यापक” बनाना है कि सदस्य देशों को “विकल्प चुनना” न पड़े। इस रणनीति के तहत, भारत न केवल आर्थिक सहयोग को बढ़ाएगा, बल्कि जलवायु परिवर्तन, विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहायता, और बहुपक्षीय व्यापार नियमों के क्षेत्र में भी नेतृत्व करेगा। साथ ही, अमेरिकी सहयोग को बनाए रखने के लिए, भारत ने आगामी जी‑20 शिखर में भी भाग लेने की योजना बनाई है, जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प भी उपस्थित रहेंगे।

निष्कर्ष: दोहरी रणनीति की जटिलता और संभावित दिशा

समग्र रूप से, India Brics की वर्तमान दिशा यह दर्शाती है कि भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर “दोहरी रणनीति” अपनाने में सक्षम है। वह ब्रिक्स के भीतर आर्थिक और राजनयिक प्रभाव को बढ़ाते हुए, अमेरिकी साथियों के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी, और व्यापार के क्षेत्रों में सहयोग को जारी रख रहा है। इस संतुलन को बनाए रखना भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, विशेषकर जब चीन‑भारत के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और रूस‑यूएस के बीच तनाव जारी रहता है। फिर भी, इस समय तक, भारत ने दिखा दिया है कि वह “संगीत कुर्सी” में अपनी सीट को सुरक्षित रखने के साथ-साथ मंच पर नई आवाज़ें जोड़ने में सक्षम है।

भविष्य में, यदि ब्रिक्स समूह अपने आर्थिक वजन को और अधिक सुदृढ़ कर पाता है, तो भारत को अपने “ब्रिक्स‑अमेरिका” संतुलन को पुनः मूल्यांकन करना पड़ सकता है। वर्तमान में, शिखर ने यह स्पष्ट किया है कि भारत न केवल ब्रिक्स के भीतर एक प्रमुख खिलाड़ी है, बल्कि वह वैश्विक राजनीति में एक ऐसा पुल भी बन रहा है, जो विभिन्न महाशक्तियों के बीच संवाद को सुगम बनाता है। इस प्रकार, India Brics की यह नई भूमिका अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में भारत की बढ़ती महत्ता को रेखांकित करती है, जबकि अमेरिकी संबंधों को तोड़े बिना एक बहुपक्षीय मंच को सशक्त बनाती है।

Source: India Brics को बढ़ाते हुए US के साथ संबंध नहीं तोड़ता

Image Credit: static.toiimg.com

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