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1990 के दोहरी हत्या के आरोपी की तलाश: 36 साल बाद कश्मीर में SIA की छापेमारी

August 12, 2026 3:01 PM

जम्मू‑कश्मीर में सुरक्षा एजेंसी (SIA) ने 36 साल बाद 1990 के दोहरी हत्या के आरोपी को पकड़ने के लिये एक व्यापक ऑपरेशन चलाया। इस कार्रवाई में राज्य के विभिन्न हिस्सों में नौ स्थानों पर छापेमारी की गई, जिससे 1990 दोहरी हत्या मामला फिर से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। इस घटना के पीछे कश्मीरी पंडित लेखक सरवनंद प्रेमी और उनके 16‑वर्षीय बेटे की हत्या का रहस्य अभी तक सुलझ नहीं पाया है, परन्तु नई जाँच की दिशा स्पष्ट हो रही है।

1990 के उस वर्ष, सरवनंद प्रेमी, जो कश्मीर में साहित्य और सामाजिक कार्यों के लिए जाने जाते थे, और उनका बेटा एक रात घर के बाहर गुप्त रूप से लुप्त हो गए। उस समय की पुलिस रिपोर्ट में बताया गया था कि दो अनजान व्यक्तियों ने उन्हें गोली मार दी। लेकिन साक्ष्य की कमी और राजनीतिक अस्थिरता के कारण केस ठहराव में रहा। अब, 2026 में, SIA ने इस पुराने केस को फिर से जीवंत किया है, जिससे कई लोगों को आशा मिली है कि न्याय अंततः मिल सकेगा।

केस की पृष्ठभूमि और प्रारंभिक जांच

सरवनंद प्रेमी कश्मीर के शरणागति जिले के एक छोटे गांव में रहते थे। उनके लेखन में कश्मीरी पंडित समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का प्रयत्न स्पष्ट था। 1990 में, जब कश्मीर में असुरक्षा की स्थिति बढ़ रही थी, तब उनके परिवार को भी हिंसा का सामना करना पड़ा। पुलिस ने शुरुआती जांच में कई संभावित संदेहियों को हिरासत में लिया, परन्तु पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण सभी को रिहा कर दिया गया। इस बीच, परिवार के सदस्य और समुदाय ने निरंतर न्याय की मांग की, लेकिन समय के साथ इस मांग का स्वर धीरे‑धीरे कम हो गया।

36 साल बाद SIA की छापेमारी

जम्मू‑कश्मीर में SIA ने हाल ही में एक समन्वित ऑपरेशन के तहत नौ स्थानों पर छापेमारी की। इन स्थानों में शहरी क्षेत्रों के साथ‑साथ दूर‑दराज़ गांव भी शामिल थे, जहाँ से आरोपियों के संभावित ठिकाने का पता लगाया गया था। छापेमारी के दौरान, एजेंटों ने घरों, दुकानों और कुछ निजी संपत्तियों को तलाशी ली, लेकिन अभी तक किसी भी प्रमुख आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर पाए हैं। इस कार्रवाई को स्थानीय मीडिया ने बड़े पैमाने पर कवर किया, जिससे 1990 दोहरी हत्या मामला फिर से सार्वजनिक ध्यान में आया।

  • श्रीनगर के एक उपनगर में दो आवासीय घर
  • अनंतनगर के एक व्यावसायिक परिसर
  • बड़ावली के एक कृषि भूमि
  • गुड़गुड़ के एक छोटे गांव में दो घर
  • रिप्पू के एक पुरानी हवेली
  • जम्मू के एक औद्योगिक क्षेत्र में गोदाम
  • डेडली की एक गुप्त गली
  • बेलगाम के एक बंकर
  • पुलवामा के एक बेकरी के पीछे स्थित अंडरग्राउंड रूम

छापेमारी के दौरान कई दस्तावेज़, मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर डिवाइस बरामद किए गए, जिनकी जांच अभी चल रही है। SIA के प्रवक्ता ने कहा कि इस ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य उन सभी संभावित सहयोगियों को उजागर करना है, जो इस हत्या में शामिल हो सकते हैं, और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि भविष्य में ऐसे मामलों में देरी न हो।

जांच के परिणाम और भविष्य की दिशा

छापेमारी के बाद, SIA ने कुछ प्रमुख साक्ष्य एकत्र किए हैं, जिनमें 1990 के आसपास के फोन कॉल रिकॉर्ड, वित्तीय लेन‑देन और कुछ गुप्त तस्वीरें शामिल हैं। इन दस्तावेज़ों की मदद से जांचकर्ताओं को अब यह समझ में आ रहा है कि हत्या के पीछे संभवतः स्थानीय गुटों और बाहरी तत्वों का सहयोग हो सकता है। हालांकि, अभी तक कोई ठोस नाम सामने नहीं आया है, लेकिन एजेंसी ने कहा कि वे सभी संभावित मार्गों को खोल कर जांच जारी रखेंगे।

जांच के अगले चरण में डिजिटल फॉरेंसिक विश्लेषण, गवाहों के पुनः पूछताछ और अंतर‑राज्य सहयोग शामिल होगा। विशेष रूप से, साक्ष्य के आधार पर संभावित आरोपी के ठिकाने का पता लगाने के लिये जम्मू‑कश्मीर में मौसम विभाग की भविष्यवाणी के अनुसार भारी बारिश के बाद आने वाली बाढ़ की स्थिति को भी ध्यान में रखा जाएगा, जिससे जलमार्गों के माध्यम से छुपे हुए ठिकानों का खुलासा हो सकता है।

वर्तमान में, स्थानीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों ने इस कदम की सराहना की है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि न्याय केवल अभियोजन तक सीमित नहीं होना चाहिए; पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा और मनोवैज्ञानिक सहायता भी प्रदान की जानी चाहिए। इस दिशा में, कई सामाजिक कार्यकर्ता और वकील ने केस के पुनः खुलने पर सार्वजनिक वकीलों की सहायता की पेशकश की है।

सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव

कश्मीर में इस तरह की पुरानी घटनाओं का पुनः उजागर होना सामाजिक ताने‑बाने को फिर से जांचने का अवसर देता है। 1990 दोहरी हत्या मामला को लेकर कई राजनीतिक दलों ने अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। कुछ ने इसे सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता के रूप में सराहा, जबकि अन्य ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई केवल तभी प्रभावी होगी जब न्यायिक प्रक्रिया तेज़ और पारदर्शी हो। इस बीच, राष्ट्रीय स्तर पर भी इस केस को लेकर चर्चा तेज़ हो रही है, जिससे भविष्य में कश्मीरी पंडितों के सुरक्षा उपायों को मजबूत करने की मांग बढ़ रही है।

अंत में, यह स्पष्ट है कि 1990 की इस दोहरी हत्या का रहस्य अभी भी कई प्रश्नों को जन्म देता है, परंतु SIA की छापेमारी ने इस मामले को फिर से जीवंत किया है। यदि जांच के परिणाम स्पष्ट होते हैं, तो यह न केवल न्याय के लिये एक बड़ी जीत होगी, बल्कि कश्मीर में शांति और भरोसे को भी पुनः स्थापित करने में मददगार सिद्ध हो सकता है।

यह लेख विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है।

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