वाशिंगटन/तेहरान। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसा खुलासा हुआ है जो पश्चिम एशिया में तनाव की जटिल परतों को एक बार फिर उजागर करता है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को इस बात की जानकारी मिली थी कि इजरायल, ईरान के दो प्रमुख वार्ताकारों की हत्या की योजना बना रहा है। और अमेरिका ने इसकी सूचना सीधे तौर पर ईरान को दे दी थी। यह अमेरिका की ईरान को चेतावनी सिर्फ एक सूचना भर नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसी कूटनीतिक और खुफिया कार्रवाई थी जिसका मकसद पश्चिम एशिया में एक बड़े संघर्ष को टालना और अपने राजनीतिक हितों की रक्षा करना था।
इस खुलासे ने अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच सदियों से चले आ रहे जटिल रिश्तों की एक नई तस्वीर पेश की है। जहां अमेरिका और इजरायल पारंपरिक रूप से सहयोगी रहे हैं, वहीं इस घटना ने दोनों देशों के बीच मतभेदों की गहराई को भी दर्शाया है। सवाल यह है कि आखिर अमेरिका ने अपने करीबी सहयोगी की संभावित गुप्त योजना की जानकारी अपने कथित विरोधी को क्यों दी? इसका जवाब शायद अमेरिकी राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय स्थिरता की चिंता में छिपा है।
क्या थी योजना और किसे था निशाना?
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया सूत्रों ने पता लगाया था कि इजरायल, ईरान के दो वरिष्ठ अधिकारियों – ईरान की संसद की स्पीकर मोहम्मद बाग़ेर ग़ालिबाफ़ और एक वरिष्ठ राजनयिक व वार्ताकार अब्बास अराग़ची – को निशाना बनाने की तैयारी कर रहा था। ये दोनों ही व्यक्ति ईरान की विदेश नीति और परमाणु वार्ताओं में अहम भूमिका निभाने वाले माने जाते हैं। अराग़ची तो ईरान के परमाणु समझौते (जेसीपीओए) पर हुई बातचीत में प्रमुख वार्ताकार रह चुके हैं। खबरों के अनुसार, अमेरिका ने इस संभावित हमले की योजना का पता लगाने के बाद, सीधे तौर पर ईरानी अधिकारियों को इसकी चेतावनी दे दी, जिसके बाद ईरान ने अपने इन अधिकारियों की सुरक्षा के इंतजाम कड़े कर दिए।
अमेरिका ने ईरान को चेतावनी क्यों दी? कूटनीतिक गणित
यह सवाल सबसे अहम है। अमेरिका ने अपने करीबी सहयोगी इजरायल की एक संभावित गुप्त कार्रवाई की जानकारी ईरान को क्यों दी? इसके पीछे कई कारण दिखाई देते हैं। पहला और सबसे प्रमुख कारण यह है कि अमेरिका उस समय ईरान के साथ परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करने की कोशिशों में जुटा हुआ था। ईरान के प्रमुख वार्ताकारों पर हमला होने से यह प्रक्रिया पूरी तरह से ध्वस्त हो सकती थी और क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात पैदा हो सकते थे। अमेरिका ऐसी किसी भी स्थिति से बचना चाहता था जो उसकी कूटनीतिक पहल को नुकसान पहुंचाए। दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि अमेरिका इजरायल की ऐसी एकतरफा कार्रवाइयों से असहमत था, जो बिना उसकी जानकारी के की जा रही थीं और जिनसे अमेरिकी हितों को खतरा हो सकता था। यह अमेरिका की ईरान को चेतावनी एक स्पष्ट संदेश था कि वह क्षेत्र में होने वाली किसी भी ऐसी कार्रवाई को बर्दाश्त नहीं करेगा जो उसकी रणनीतिक योजनाओं के रास्ते में रोड़ा अटकाए।
इजरायल-ईरान शत्रुता का लंबा इतिहास
इजरायल और ईरान के बीच शत्रुता नया मामला नहीं है। ईरान की 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही दोनों देश एक-दूसरे के कट्टर विरोधी बन गए। इजरायल, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए सीधा खतरा मानता है और पिछले कई वर्षों में ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों की हत्याओं और परमाणु सुविधाओं पर साइबर हमलों सहित कई गुप्त व सैन्य कार्रवाइयों को अंजाम देता रहा है। ईरान भी अपनी तरफ से इजरायल विरोधी समूहों जैसे हिजबुल्लाह और हमास को समर्थन देता रहा है। इस पृष्ठभूमि में, इजरायल द्वारा ईरानी अधिकारियों को निशाना बनाने की योजना बनाना एक नई, लेकिन आश्चर्यजनक नहीं, कड़ी मानी जा सकती है। हालांकि, इस बार अमेरिका का हस्तक्षेप स्थिति को एक नया मोड़ दे गया।
विश्व राजनीति पर प्रभाव: एक नई त्रिकोणीय दौड़
इस घटना का प्रभाव सिर्फ इजरायल-ईरान संबंधों तक सीमित नहीं रहने वाला। इसने तीन देशों – अमेरिका, इजरायल और ईरान – के बीच एक नई तरह की त्रिकोणीय दौड़ की शुरुआत की है। अमेरिका और इजरायल के बीच विश्वास की कमी साफ दिखाई दी है। दूसरी ओर, ईरान के लिए यह घटना यह साबित करती है कि अमेरिका, इजरायल की हर कार्रवाई का समर्थन करने को तैयार नहीं है, खासकर तब जब वह अमेरिकी हितों के विपरीत हो। यह स्थिति भविष्य में अमेरिका-ईरान वार्ता के लिए एक नया आधार भी तैयार कर सकती है। हालांकि, इससे इजरायल में अमेरिका के प्रति नाराजगी भी पैदा हुई है, जो भविष्य में दोनों देशों के सैन्य व खुफिया सहयोग को प्रभावित कर सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम की एक और अहम कड़ी हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा से भी जुड़ी है, जहां ईरान और अमेरिका के बीच तनाव की स्थिति बनी रहती है। हाल ही में ओमान और ईरान के बीच हुआ एक सुरक्षा समझौता इस जलमार्ग को स्थिर रखने की दिशा में एक कोशिश मानी जा रही है। वहीं, अमेरिका-ईरान तनाव के बीच हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों का आवागमन हमेशा अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता का केंद्र बना रहता है।
आगे की राह: क्या बदलेगा समीकरण?
इस खुलासे के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आगे क्या होगा। क्या इजरायल और अमेरिका के रिश्तों में दरार और गहरी होगी? क्या ईरान इस घटना को अमेरिका के साथ बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए एक अवसर के तौर पर देखेगा? या फिर यह घटना इजरायल को और भी आक्रामक बना देगी? विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की यह चेतावनी एक सीमा तय करने की कोशिश थी। उसने इजरायल को यह संदेश दिया है कि वह कुछ हद तक ही उसकी कार्रवाइयों को सहन करेगा। हालांकि, पश्चिम एशिया की गतिशील राजनीति में, यह घटना एक नए प्रकार के जोखिम को भी जन्म देती है, जहां गुप्त योजनाओं का पर्दाफाश होना आम बात हो सकती है।
इस मामले ने एक बार फिर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका-ईरान संबंध कितने नाजुक और बहुआयामी हैं। जहां एक ओर दोनों देश सीधे टकराव से बचने की कोशिश करते हैं, वहीं दूसरी ओर वार्ता की प्रक्रिया हमेशा अप्रत्याशित घटनाओं की भेंट चढ़ जाती है। अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के विश्लेषण से पता चलता है कि ऐसी रुकावटें नई नहीं हैं। इस संदर्भ में, यह अमेरिका की ईरान को चेतावनी एक असाधारण कदम था, जिसका उद्देश्य शायद इसी नाजुक प्रक्रिया को बचाए रखना था।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि यह घटना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गुप्त युद्ध और कूटनीति की परस्पर निर्भरता को दर्शाती है। अमेरिका ने, अपने ही सहयोगी की योजना को विफल करके, एक बड़े संघर्ष को रोकने और अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं को सुरक्षित रखने का रास्ता चुना। भविष्य में, ऐसी चेतावनियों का चलन बढ़ सकता है, जहां देश अपने सहयोगियों की कार्रवाइयों पर अंकुश लगाने के लिए सार्वजनिक या गुप्त दबाव का इस्तेमाल करें। फिलहाल, पश्चिम एशिया का यह तनावपूर्ण त्रिकोण जस का तस बना हुआ है, लेकिन इस घटना ने उसकी शक्तियों के समीकरण में निश्चित रूप से हलचल पैदा कर दी है। अमेरिका की ईरान को चेतावनी का असर अगले कुछ महीनों में अमेरिकी विदेश नीति और क्षेत्रीय सुरक्षा में होने वाले बदलावों से साफ हो जाएगा।
यह लेख विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है।









